दिल्ली में किक्रेट के सूरमाओं के स्वागत के फूल अभी मुरझाए भी नहीं थे कि हॉकी के कांटों ने जख्मी कर दिया ।
आखिर जिम्मेदार कौन है ?लोग कोच या हॉकी महासंघ के अध्यक्ष के पी एस गिल को दोषी मान रहे हैं ।लेकिन क्या हमलोग अपने गिरेबां में झांक रहे हैं ?क्या हमारे अंदर हॉकी बची थी? ये कोई पहली हार नही हैं ।क्या इससे पहले हॉकी के हार पर हम सड़को पर उतरे थे ?
मै जानता हूं सड़क पर उतरना हल नही हैं ।लेकिन कम से कम इससे हमारे लगाव का पता तो चलता ही है ।हॉकी के गिरते स्तर के लिए महासंघ तो जिम्मेदार है ही ,पर कम दोषी हमलोग भी नहीं ।आज हमलोग जो इस हार पर चिल्ला रहे हैं,इसकी मौत में हमारा भी बड़ा हाथ है ।क्या हमने हॉकी को वो जगह दी जो बतौर राष्ट्रीय खेल उसे मिलनी चाहीए ?
दिल पर हाथ रखिए क्या इसी देश में हॉकी के साथ सौतेला व्यवहार नही हुआ है ? क्या धोनी,सचिन और द्रविड़ की तरह हमने अपने कमरों में धनराज पिल्ले और दिलीप टिर्की की तस्वीर कभी लगाई ? गांगूली को टीम से निकाले जाने पर जिस तरह का विरोध सड़क से लेकर संसद तक हुआ क्या वही आवाज धनराज को टीम से निकाले जाने के वक्त सूनाई दी ?आज किक्रेट में बल्लेबाजों का क्रम बदल दिया जाए तो चाय के नुक्कड़ से लेकर संपादकों के कमरों में बहस होने लगती है लेकिन जब हॉकी में अनाप शनाप फैसले लिए जा रहे थे तो क्या वो सब्जी की कीमतों में हो रही बढोतरी से ज्यादा महत्वपूर्ण लग रही थी ।
हम इतिहास और गौरवशाली अतीत की बात करते हैं लेकिन क्या हमने हॉकी को अपने ही देश में धर्म का दर्जा दिया ।धोनी का सिक्सर जो राहत हमें देता है क्या वही सुकून दिलीप की पेनाल्टी दे पाती है ।सचिन का 99 पर आउट होना जिस तरह दप्तर लेट पहुंचने से ज्यादा परेशान करता है क्या वही गुस्सा सेंटर फारवर्ड के असफल हो जाने पर पैदा होता है ।----------शायद नहीं ।
इसलिए हॉकी की इस हालत के लिए हम सब जिम्मेदार हैं ।
सोमवार, 10 मार्च 2008
ये समाज के नये नायक हैं ।
अनामिका,रोहनप्रीत और तन्मय ने लिटील चैम्पस प्रतियोगिता में जीत दर्ज की ।
ये एक शो के विजेता भर नहीं समाज के नये नायक हैं ।नायक इसलिए कि इन्होंने सपनों को साकार करने की राह दिखाई है ।नायक इसलिए भी कि मरियानी,पटियाला और लखनउ जैसे छोटे शहरों से आकर ये महानगरों में अपनी जीत दर्ज कराते हैं ।इन नन्हें विजेताओं की जीत बताती है कि मन में लगन और दिल में जूनुन हो तो आसमां को भी करीब लाया जा सकता है ।ये शाहरूख और अमिताभ की तरह सपनों की कोई दुनिया नहीं रचते बल्कि मासूम आंखों में देखे गये ख्वाब के सच होने की कहानी बयां करते हैं ।
ये बच्चे हाशिए पर खड़े एक बड़े तबके के हौसलों की जीत की कहानी कहते हैं ।तालियों की गड़गड़ाहट और जगमगाती रोशनी सिर्फ इनके इनके चेहरों पर ही लाली नहीं लाती बल्कि महानगरों से दूर रह रहे कई बच्चों के आंखों में सपनों की बुनियाद खड़ी करती हैं ।इनकी जीत उस मिथक को भी तोड़ती है कि मध्यम वर्ग के मां बाप अपने बच्चों को डाक्टर या इंजीनियर ही बनाना चाहते हैं ।
इनको मिले एक करोड़ से भी ज्यादा वोट ये बताते हैं कि महानगरों में रहने वाले लोग छोटे शहरों से निकले इन बड़े नायकों को सलाम कर रहा है ।इनको मिले लाखों का इनाम हाशिए पर खड़े समाज के बुलंद इरादों की कहानी कहता हैं ।
आज जबकि मध्यम वर्ग में कुछ करने की उकताहट और कुछ न कर पाने की वजह से उपजा एक आक्रोश है तो ऐसे में इनकी जीत समाज के उस तबके को खड़े होने का हौसला देता है साथ ही ये भरोसा भी कि वो किसी से कम नहीं ।
ये एक शो के विजेता भर नहीं समाज के नये नायक हैं ।नायक इसलिए कि इन्होंने सपनों को साकार करने की राह दिखाई है ।नायक इसलिए भी कि मरियानी,पटियाला और लखनउ जैसे छोटे शहरों से आकर ये महानगरों में अपनी जीत दर्ज कराते हैं ।इन नन्हें विजेताओं की जीत बताती है कि मन में लगन और दिल में जूनुन हो तो आसमां को भी करीब लाया जा सकता है ।ये शाहरूख और अमिताभ की तरह सपनों की कोई दुनिया नहीं रचते बल्कि मासूम आंखों में देखे गये ख्वाब के सच होने की कहानी बयां करते हैं ।
ये बच्चे हाशिए पर खड़े एक बड़े तबके के हौसलों की जीत की कहानी कहते हैं ।तालियों की गड़गड़ाहट और जगमगाती रोशनी सिर्फ इनके इनके चेहरों पर ही लाली नहीं लाती बल्कि महानगरों से दूर रह रहे कई बच्चों के आंखों में सपनों की बुनियाद खड़ी करती हैं ।इनकी जीत उस मिथक को भी तोड़ती है कि मध्यम वर्ग के मां बाप अपने बच्चों को डाक्टर या इंजीनियर ही बनाना चाहते हैं ।
इनको मिले एक करोड़ से भी ज्यादा वोट ये बताते हैं कि महानगरों में रहने वाले लोग छोटे शहरों से निकले इन बड़े नायकों को सलाम कर रहा है ।इनको मिले लाखों का इनाम हाशिए पर खड़े समाज के बुलंद इरादों की कहानी कहता हैं ।
आज जबकि मध्यम वर्ग में कुछ करने की उकताहट और कुछ न कर पाने की वजह से उपजा एक आक्रोश है तो ऐसे में इनकी जीत समाज के उस तबके को खड़े होने का हौसला देता है साथ ही ये भरोसा भी कि वो किसी से कम नहीं ।
गुरुवार, 14 फ़रवरी 2008
मुंबई की सड़कों पे मचे उत्पात पर इस शहर की कहानी मुंबई की ही जुबानी
मैं मुंबई हुं--------------
किसी के लिए हादसों का शहर तो किसी के लिए सपनों की उड़ान । मैंने अपने शरीर पर कई जख्म झेले हैं ।मुझे 1993 का वो खौफनाक मंजर भी याद जब हाजी अली के सजदे और सिद्धीविनायक की आरती में साथ-साथ झूकने वाले सर एक दूसरे के खून के प्यासे हो गये थे ।मैंने भारत में आतंक की पहली दस्तक भी अपने सीने पर झेली है ।
पर तमाम हादसों के बाद मैंने इस शहर को साथ खड़े होते भी देखा है
आज कौन मुंबई का और कौन बाहर वाला इस लड़ाई ने मेरी रूह को घायल कर दिया है ।मेरे लिए दोनों अपने हैं ।जब पूरी मुंबई पानी में डूबी थी या जब आतंकी लोकल ट्रेनों में धमाके कर मुझे डराने में लगे थे तब मेरे दोनो बच्चों के आंखों में आंसू थे ।
मराठीयों नें अगर खून-पसीने से मेरी बुनीयाद खड़ी की है तो उत्तर भारतीयों ने इसे सजाया और संवारा है ।पर आज मेरे एक हाथ ही दूसरे पर वार कर रहें हैं।
मुझे राज ठाकरे और अबू आजमी के बयानों की परवाह नहीं ।लेकिन मुंबई की सड़कों पर मजलूमों के साथ हो रहा अन्नाय मुझे बौना कर देता है ।ये तोड़फोड़ मुझे आभास दिलाते हैं कि मैं खुद को इतना बड़ा न कर पाया कि मराठी और गैर मराठी दोनों को मुकम्मल जहां दिला सकुं।
इन्हें पता नहीं कि जिस आवाज के पीछे ये चल रहें हैं वो इनके बीच एक ऐसी दरार बनाना चाहता है जिस पर चलकर उसके हित पूरे हो सकें ।मुझ डर बस इस बात का है कि सपनों के इस शहर के सपने कहीं बीच रास्ते में हीं न टूट जाये ।
किसी के लिए हादसों का शहर तो किसी के लिए सपनों की उड़ान । मैंने अपने शरीर पर कई जख्म झेले हैं ।मुझे 1993 का वो खौफनाक मंजर भी याद जब हाजी अली के सजदे और सिद्धीविनायक की आरती में साथ-साथ झूकने वाले सर एक दूसरे के खून के प्यासे हो गये थे ।मैंने भारत में आतंक की पहली दस्तक भी अपने सीने पर झेली है ।
पर तमाम हादसों के बाद मैंने इस शहर को साथ खड़े होते भी देखा है
आज कौन मुंबई का और कौन बाहर वाला इस लड़ाई ने मेरी रूह को घायल कर दिया है ।मेरे लिए दोनों अपने हैं ।जब पूरी मुंबई पानी में डूबी थी या जब आतंकी लोकल ट्रेनों में धमाके कर मुझे डराने में लगे थे तब मेरे दोनो बच्चों के आंखों में आंसू थे ।
मराठीयों नें अगर खून-पसीने से मेरी बुनीयाद खड़ी की है तो उत्तर भारतीयों ने इसे सजाया और संवारा है ।पर आज मेरे एक हाथ ही दूसरे पर वार कर रहें हैं।
मुझे राज ठाकरे और अबू आजमी के बयानों की परवाह नहीं ।लेकिन मुंबई की सड़कों पर मजलूमों के साथ हो रहा अन्नाय मुझे बौना कर देता है ।ये तोड़फोड़ मुझे आभास दिलाते हैं कि मैं खुद को इतना बड़ा न कर पाया कि मराठी और गैर मराठी दोनों को मुकम्मल जहां दिला सकुं।
इन्हें पता नहीं कि जिस आवाज के पीछे ये चल रहें हैं वो इनके बीच एक ऐसी दरार बनाना चाहता है जिस पर चलकर उसके हित पूरे हो सकें ।मुझ डर बस इस बात का है कि सपनों के इस शहर के सपने कहीं बीच रास्ते में हीं न टूट जाये ।
सोमवार, 11 फ़रवरी 2008
कौन किसका आदमी
इसका आदमी,उसका आदमी---------------------आखिर कौन किसका आदमी ।
पत्रकारिता में ये बीमारी तो पहले से थी लेकिन अब इसने महामारी का रूप ले लिया है। कस्बों और गांवों में औरतों के आदमी हुआ करते हैं लेकिन यहां आदमीयों के आदमी हैं। अन्दर आने के लिए किसी का आदमी, बने रहने के लिए किसी का आदमी और आगे बढ़ने के लिए भी किसी का आदमी होना बेहद जरूरी है।
घर बैठ किसी के साथ सुरापान तो कर सकते हैं लेकिन दफ्तर के आहाते में किसी के साथ चाय की चुस्की भी ली तो उसके आदमी। नतीजा... आपका साथ देने वाला शख्स अगर दफ्तर में हावी है तो चौका वरना आप तत्काल प्रभाव से टीम के सोलहवें खिलाड़ी की मानिंद। चौके लगाने का दमखम रखते होंगे अपनी बला से लेकिन फिलहाल तो किस्मत पर ग्रहण लगता जान पड़ता है। मानो पेप्सी की बोतल लेकर ब्रेक का इंतजार करना ही भाग्य में बदा है।
शायद वो समय कुछ और रहा होगा जब दादा परदादा कहा करते थे कि सबसे मिलकर रहो लेकिन अब तो हालात ये है कि इधर के रहो या उधर के रहो ।पत्रकारिता में नये हैं या युं कहें कि नौसिखये हैं तो किसी का आदमी होना और भी जरूरी है। चुंकि बेलौसपन से किसी के आदमी हो जाने का खतरा बढ़ जाता है । इसलिए बचना थोड़ा मुश्किल है
डर तो है लेकिन अर्थशास्त्र की परिभाषा के अनुसार जोखिम उठाने वाले ही उद्यमी कहलाते हैं ।इसलिए आप अगर इस बीमारी को जीना सीख गये या युं कहें कि पाला बदलनें मे माहिर हो गये तो रिलांयस मोबाइल की तरह दुनिया आपकी मुट्ठी में ।
मेरे एक सहयोगी वसीम बरेलवी का एक शेर गाहे बगाहे गुनगुनाते हैं -------मेरा अहले सफर कब किधर का हो जाए,ये वो नहीं जो हर रहगुजर का हो जाए—जिने का हक सिर्फ उसी को है दुनिया में जो इधर का लगता रहे और उधर का हो जाये ।
पर सातवीं में तो मेरे मौलवी साहब ने बताया था कि आदमी तो वही है जो इसका भी रहे और उसका भी हो।पर छोटे से अनुभव और कइ अपरिचित कहानियों के बाद अब मौलवी साहब झूठे और बोमानी लगने लगे हैं ।
पत्रकारिता में ये बीमारी तो पहले से थी लेकिन अब इसने महामारी का रूप ले लिया है। कस्बों और गांवों में औरतों के आदमी हुआ करते हैं लेकिन यहां आदमीयों के आदमी हैं। अन्दर आने के लिए किसी का आदमी, बने रहने के लिए किसी का आदमी और आगे बढ़ने के लिए भी किसी का आदमी होना बेहद जरूरी है।
घर बैठ किसी के साथ सुरापान तो कर सकते हैं लेकिन दफ्तर के आहाते में किसी के साथ चाय की चुस्की भी ली तो उसके आदमी। नतीजा... आपका साथ देने वाला शख्स अगर दफ्तर में हावी है तो चौका वरना आप तत्काल प्रभाव से टीम के सोलहवें खिलाड़ी की मानिंद। चौके लगाने का दमखम रखते होंगे अपनी बला से लेकिन फिलहाल तो किस्मत पर ग्रहण लगता जान पड़ता है। मानो पेप्सी की बोतल लेकर ब्रेक का इंतजार करना ही भाग्य में बदा है।
शायद वो समय कुछ और रहा होगा जब दादा परदादा कहा करते थे कि सबसे मिलकर रहो लेकिन अब तो हालात ये है कि इधर के रहो या उधर के रहो ।पत्रकारिता में नये हैं या युं कहें कि नौसिखये हैं तो किसी का आदमी होना और भी जरूरी है। चुंकि बेलौसपन से किसी के आदमी हो जाने का खतरा बढ़ जाता है । इसलिए बचना थोड़ा मुश्किल है
डर तो है लेकिन अर्थशास्त्र की परिभाषा के अनुसार जोखिम उठाने वाले ही उद्यमी कहलाते हैं ।इसलिए आप अगर इस बीमारी को जीना सीख गये या युं कहें कि पाला बदलनें मे माहिर हो गये तो रिलांयस मोबाइल की तरह दुनिया आपकी मुट्ठी में ।
मेरे एक सहयोगी वसीम बरेलवी का एक शेर गाहे बगाहे गुनगुनाते हैं -------मेरा अहले सफर कब किधर का हो जाए,ये वो नहीं जो हर रहगुजर का हो जाए—जिने का हक सिर्फ उसी को है दुनिया में जो इधर का लगता रहे और उधर का हो जाये ।
पर सातवीं में तो मेरे मौलवी साहब ने बताया था कि आदमी तो वही है जो इसका भी रहे और उसका भी हो।पर छोटे से अनुभव और कइ अपरिचित कहानियों के बाद अब मौलवी साहब झूठे और बोमानी लगने लगे हैं ।
गुरुवार, 18 अक्टूबर 2007
गलती कहां हूई
मैंने समझा तु छोटा है,
तु नादान है,
गलतियां गलती से हो जाती होगी,
नही मालूम था,
तूझे सब मालूम है,
तेरा हंसना,तेरा रोना
सब नाटक है,
एक तो गलती,
उस पर दिलेरी,
शायद कमी मेरी थी,
तालीम ही सही न दे सका,
शायद गला तेरा तर हो गया,
पर सीना मेरा छलनी हो गया,
तु भले सुरूर में था,
पर मेरी आखें नम थी,
बावजूद इसके तू नादान है,
तू छोटा है ।
तु नादान है,
गलतियां गलती से हो जाती होगी,
नही मालूम था,
तूझे सब मालूम है,
तेरा हंसना,तेरा रोना
सब नाटक है,
एक तो गलती,
उस पर दिलेरी,
शायद कमी मेरी थी,
तालीम ही सही न दे सका,
शायद गला तेरा तर हो गया,
पर सीना मेरा छलनी हो गया,
तु भले सुरूर में था,
पर मेरी आखें नम थी,
बावजूद इसके तू नादान है,
तू छोटा है ।
सोमवार, 15 अक्टूबर 2007
क्या नरेन्द्र मोदी बदल गए हैं

इस बार मोदी को सुनकर यही लगा कि क्या यह वही व्यक्ति है जिसने हमारी गंगा जमुनी तहजीब के पाटों को इतना दूर कर दिया कि उसे फिर से पाटना नामुमकिन तो नहीं मुश्किल जरूर है।
मैंने बचपन में एक कहानी पढ़ी थी कि जंगल में चुनाव का माहौल है और भेड़िया अपने नथुनों में घास फूस दबाकर भेड़ों के बीच वोट मांगने जाता है और कहता है कि अब मैं संत हो गया हूं, शाकाहारी हो गया हूं।
लेकिन एक दूसरी कहानी भी है कि डाकू रत्नाकर, वाल्मिकी हो गया । और रामायण की रचना कर डाली ।
सचमुच में रत्नाकर, वाल्मिकी बना है या भेड़िये ने नथुनों में घास दबा रखी है, इसका फैसला तो गुजरात की जनता को करना है।
लेकिन एक बात तो तय है कि मोदी ने अपने अक्स को बदलने की कोशिश जरूर की है । मोदी ही नही गोधरा के बाद से अब तक भारत भी बहुत बदल चुका है ।
रामसेतु अब बदन में आग नहीं लगाती,लेकिन पेट की भूख रिलांयश फ्रेश स्टोर में तोड़-फोड़ करती है।
अब गुजरात की जनता तय करे कि माफ करना है या साफ करना है ।
अब गुजरात की जनता तय करे कि माफ करना है या साफ करना है ।
शनिवार, 13 अक्टूबर 2007
सदाबहार गायक थे किशोर कुमार
किशोर कुमार जितने अच्छे गायक थे उतने ही अच्छे अभिनेता भी थे
मस्ती भरी, शोख़ और खनकदार आवाज़ से दशकों तक हिंदी सिनेमा के पार्श्वगायन में छाए रहे किशोर कुमार को उनकी बीसवीं पुण्यतिथि के मौके पर समूचा संगीत जगत याद कर रहा है.
1950-70 के दशकों में सुप्रसिद्ध गायक मुकेश और मोहम्मद रफ़ी के समकालीन रहे किशोर कुमार को जहां उनके रोमांटिक और दर्द भर गानों के लिए याद किया जाता है तो वहीं वे आज के पॉप और हिप-हॉप जगत में भी वह बराबर लोकप्रिय हैं.
आभास कुमार गांगुली यानी किशोर कुमार का जन्म चार अगस्त 1929 को मध्यप्रदेश के खंडवा में एक बंगाली परिवार में हुआ था. उनके पिता कुंजालाल गांगुली एक वकील थे. किशोर चार भाई बहनों में सबसे छोटे थे.
किशोर जब छोटे थे तभी उनके सबसे बड़े भाई अशोक कुमार मुम्बई जाकर बतौर अभिनेता स्थापित हो चुके थे. उनके एक और भाई अनूप कुमार भी फ़िल्मों में काम कर रहे थे.
किशोर का भी मन भी बस संगीत और अभिनय में ही रमा रहता था सो उन्होंने भी बालीवुड की राह पकड़ने की ठानी और खिंचे चले आए मुम्बई.
सफ़र
उनको 1948 में बाम्बे टॉकीज़ की फिल्म 'ज़िद्दी' में पहला गाना गाने का मौका मिला. बतौर अभिनेता उनकी पहली फ़िल्म 1951 में फणी मजूमदार की 'आंदोलन' रही. 1954 में उन्होंने बिमल राय की 'नौकरी' में एक बेरोजगार युवक का किरदार निभाया.
बहुत सीरियस क़िस्म के आदमी थे, समझते सब थे लेकिन ज़ाहिर नहीं करते थे. हर बात मज़ाक में उड़ाना, नकलें करना, उछलकूद करना उनकी आदत थी. उनके साथ काम करना खुशनसीबी रही
लता मंगेशकर, प्रसिद्ध पार्श्वगायिका
'न्यू देलही', 'आशा', 'झुमरू', 'हाफ़ टिकट', 'चलती का नाम गाड़ी' उनकी कुछ अहम फ़िल्में रही. लेकिन फ़िल्म 'पड़ोसन' में निभाए गए उनके किरदार को तो भुलाया ही नहीं जा सकता. उन्होंने लगभग 81 फ़िल्मों में अभिनय किया था.
अभिनय तो मस्तमौला किशोर के व्यक्तित्व का सिर्फ़ एक आयाम था. महुमुखी प्रतिभा के धनी किशोर दा को गायकी में वास्तविक मौक़ा एसडी बर्मन ने दिया. किशोर कुमार ने लगभग 574 फ़िल्मों के लिए गाना गाया था.
बर्मन दा ने उनकी उम्दा गायकी को पहचान कर फ़िल्म 'मुनीम जी', 'टैक्सी ड्राइवर', 'फंटूश', 'नौ दो ग्यारह', 'पेइंग गेस्ट', 'गाईड', 'ज्वेल थीफ़', 'प्रेमपुजारी', 'तेरे मेरे सपने' में कभी न भूलने वाले गाने गवाए. फ़िल्म डॉन में 'खइके पान बनारस वाला' ने तो किशोर दा को मानो अमर ही कर दिया.
अनोखी प्रतिभा
किशोर कुमार अद्भुद प्रतिभा के धनी थे. उन्होंने हिंदी के अलावा तमिल, मराठी, असमी, गुजराती, कन्नड़, भोजपुरी, मलयालम और उड़िया भाषा में भी गाने गाए.
कुंदन लाल सहगल को गायकी में अपना गुरू मानने वाले किशोर कुमार ने सुप्रसिद्ध पार्श्वगायिकाओं आशा और लता मंगेशकर के साथ बेहद हिट गाने दिए. लता जी को तो वह बहन मानकर राखी भी बंधवाते थे.
किशोर दा को याद करते हुए लता जी कहती हैं, “ बहुत सीरियस क़िस्म के आदमी थे, समझते सब थे लेकिन ज़ाहिर नहीं करते थे. हर बात मज़ाक में उड़ाना, नकलें करना, उछलकूद करना उनकी आदत थी. उनके साथ काम करना खुशनसीबी रही".
हिंदी पार्श्वगायकों के आज के दौर के कई गायक किशोर दा को अपना आदर्श मानते थे. उनको मलाल है कि वह उनके साथ काम नहीं कर सके. मशहूर गायक अभिजीत के लिए किशोर आज भी जिंदा हैं.
किशोर कुमार को 1969 में फ़िल्म आराधना के लिए बेहतरीन पार्श्रगायकी के लिए फ़िल्म फेयर एवार्ड मिला था. उन्हें गायकी के लिए रिकार्ड आठ बार यह पुरस्कार मिला था.
गायकी के साथ साथ किशोर दा 70 के दशक के बाद निर्देशन में भी हाथ आजमाया और लगभग 12 फिल्में निर्देशित कीं हालांकि इसमें उन्हें सफलता हाथ नहीं लगी.
आज भले ही किशोर दा को हमारे बीच से गए बीस साल गुजर गए हों लेकिन उनकी समय की सीमा की लांघ कर आज भी उनकी आवाज़ की कशिश सबको दीवाना बनाए हुए है.
साभार------बीबीसी
मस्ती भरी, शोख़ और खनकदार आवाज़ से दशकों तक हिंदी सिनेमा के पार्श्वगायन में छाए रहे किशोर कुमार को उनकी बीसवीं पुण्यतिथि के मौके पर समूचा संगीत जगत याद कर रहा है.
1950-70 के दशकों में सुप्रसिद्ध गायक मुकेश और मोहम्मद रफ़ी के समकालीन रहे किशोर कुमार को जहां उनके रोमांटिक और दर्द भर गानों के लिए याद किया जाता है तो वहीं वे आज के पॉप और हिप-हॉप जगत में भी वह बराबर लोकप्रिय हैं.
आभास कुमार गांगुली यानी किशोर कुमार का जन्म चार अगस्त 1929 को मध्यप्रदेश के खंडवा में एक बंगाली परिवार में हुआ था. उनके पिता कुंजालाल गांगुली एक वकील थे. किशोर चार भाई बहनों में सबसे छोटे थे.
किशोर जब छोटे थे तभी उनके सबसे बड़े भाई अशोक कुमार मुम्बई जाकर बतौर अभिनेता स्थापित हो चुके थे. उनके एक और भाई अनूप कुमार भी फ़िल्मों में काम कर रहे थे.
किशोर का भी मन भी बस संगीत और अभिनय में ही रमा रहता था सो उन्होंने भी बालीवुड की राह पकड़ने की ठानी और खिंचे चले आए मुम्बई.
सफ़र
उनको 1948 में बाम्बे टॉकीज़ की फिल्म 'ज़िद्दी' में पहला गाना गाने का मौका मिला. बतौर अभिनेता उनकी पहली फ़िल्म 1951 में फणी मजूमदार की 'आंदोलन' रही. 1954 में उन्होंने बिमल राय की 'नौकरी' में एक बेरोजगार युवक का किरदार निभाया.
बहुत सीरियस क़िस्म के आदमी थे, समझते सब थे लेकिन ज़ाहिर नहीं करते थे. हर बात मज़ाक में उड़ाना, नकलें करना, उछलकूद करना उनकी आदत थी. उनके साथ काम करना खुशनसीबी रही
लता मंगेशकर, प्रसिद्ध पार्श्वगायिका
'न्यू देलही', 'आशा', 'झुमरू', 'हाफ़ टिकट', 'चलती का नाम गाड़ी' उनकी कुछ अहम फ़िल्में रही. लेकिन फ़िल्म 'पड़ोसन' में निभाए गए उनके किरदार को तो भुलाया ही नहीं जा सकता. उन्होंने लगभग 81 फ़िल्मों में अभिनय किया था.
अभिनय तो मस्तमौला किशोर के व्यक्तित्व का सिर्फ़ एक आयाम था. महुमुखी प्रतिभा के धनी किशोर दा को गायकी में वास्तविक मौक़ा एसडी बर्मन ने दिया. किशोर कुमार ने लगभग 574 फ़िल्मों के लिए गाना गाया था.
बर्मन दा ने उनकी उम्दा गायकी को पहचान कर फ़िल्म 'मुनीम जी', 'टैक्सी ड्राइवर', 'फंटूश', 'नौ दो ग्यारह', 'पेइंग गेस्ट', 'गाईड', 'ज्वेल थीफ़', 'प्रेमपुजारी', 'तेरे मेरे सपने' में कभी न भूलने वाले गाने गवाए. फ़िल्म डॉन में 'खइके पान बनारस वाला' ने तो किशोर दा को मानो अमर ही कर दिया.
अनोखी प्रतिभा
किशोर कुमार अद्भुद प्रतिभा के धनी थे. उन्होंने हिंदी के अलावा तमिल, मराठी, असमी, गुजराती, कन्नड़, भोजपुरी, मलयालम और उड़िया भाषा में भी गाने गाए.
कुंदन लाल सहगल को गायकी में अपना गुरू मानने वाले किशोर कुमार ने सुप्रसिद्ध पार्श्वगायिकाओं आशा और लता मंगेशकर के साथ बेहद हिट गाने दिए. लता जी को तो वह बहन मानकर राखी भी बंधवाते थे.
किशोर दा को याद करते हुए लता जी कहती हैं, “ बहुत सीरियस क़िस्म के आदमी थे, समझते सब थे लेकिन ज़ाहिर नहीं करते थे. हर बात मज़ाक में उड़ाना, नकलें करना, उछलकूद करना उनकी आदत थी. उनके साथ काम करना खुशनसीबी रही".
हिंदी पार्श्वगायकों के आज के दौर के कई गायक किशोर दा को अपना आदर्श मानते थे. उनको मलाल है कि वह उनके साथ काम नहीं कर सके. मशहूर गायक अभिजीत के लिए किशोर आज भी जिंदा हैं.
किशोर कुमार को 1969 में फ़िल्म आराधना के लिए बेहतरीन पार्श्रगायकी के लिए फ़िल्म फेयर एवार्ड मिला था. उन्हें गायकी के लिए रिकार्ड आठ बार यह पुरस्कार मिला था.
गायकी के साथ साथ किशोर दा 70 के दशक के बाद निर्देशन में भी हाथ आजमाया और लगभग 12 फिल्में निर्देशित कीं हालांकि इसमें उन्हें सफलता हाथ नहीं लगी.
आज भले ही किशोर दा को हमारे बीच से गए बीस साल गुजर गए हों लेकिन उनकी समय की सीमा की लांघ कर आज भी उनकी आवाज़ की कशिश सबको दीवाना बनाए हुए है.
साभार------बीबीसी
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