सोमवार, 12 मई 2008

तेरा मेरा रिश्ता क्या है

तेरा मेरा रिश्ता क्या है
ना मुझे मालुम ना तुझे मालूम
पर ढूंढती हैं तुझे, मेरी आंखे
तकती हैं तेरा रास्ता हरदम


तु मुझे पसंद हैं,सच कहुं तो
ये भी ना मालूम
फिर भी ना जाने क्यों
तेरा साथ पसंद हैं मुझे
तेरी शोखी,तेरी अदाएं
प्रभावित नही करती मुझे
फिर भी ना जाने क्यों
मरू में भटकता
मृग बन जाता हुं मैं


तेरा मजाक ही सही
पर किनारों को छू जाता है
तूम बस औरों की तरह हो
फिर भी ना जाने क्यों
तेरा पास से गुजरना
मुझे खास बना जाता है


युं तो,मैं बहुत चौकन्ना हुं
पर जब तुम मुझे कुछ
कह रही होती हो
बस तुम्हें देखता रहता हुं
तेरे शब्द मेरे कानों तक पहुंचते ही नही
बस तेरे होठों को हिलते देखता रहता हुं


तेरे ना होने पर
तेरे होने का मतसब समझ आता है
फीर भी
तेरा मेरा रिश्ता क्या है
ना मुझे मालुम ना तुझे मालूम
पर ढूंढती हैं तुझे, मेरी आंखे
तकती हैं तेरा रास्ता हरदम

शनिवार, 10 मई 2008

आरक्षण की खुशी

लम्बे समय बाद घर बात हुई थी ।कुछ समय की कमी के कारण तो कुछ मन नहीं होता था ।ऑफिस से देर रात घर लौटो, होटल से खाना पैक कराओ और टी.वी. देखते हुए सो जाओ ।सुबह देर से जागो,आनन-फानन में तैयार हो कर दफ्तर पहुंचो और फिर वही कहानी ।
खैर उस दिन घर फोन लगाया तो अम्मा से बात हुई ।अम्मा ने बताया कि गांव से हमारे खेतों में काम करने वाली रजिया बुआ आई है ।बुआ इसलिए की हम सब बच्चे उन्हें बचपन से ही बुआ कहते थे ।रजिया बुआ से दुनिया जहान की बातें हुई ।गांव की,गांव के लोगो की,पुराने किस्सों की, उन किस्सों के नये कोपलों की ।
अब गांव भी पहले जैसा नहीं रहा,कम देर के लिए ही सही बिजली रहती है,कुछ घरों में टी.वी.की आवाजें भी गुंजने लगी है।इन कुछ घरों में उन बाभनों के घर शामिल हैं जो अपनी पुश्तैनी जमीन को बेच कर जी रहे हैं और कुछ उन छोटी जातियों के घर शामिल हैं जिनके बच्चे कम उम्र में ही बड़े होकर पंजाब के खेतों और सूरत के फैक्ट्रियों में कमाने के लिए चले गए थे ।
इस टी.वी. ने भले ही शहरों में अपराध और मानसिक अवसाद को बढ़ावा दिया हो लेकिन गांवों में इसने चाहत और सपनों को एक विस्तार दिया है ।गांव की पगडंडियों पर भी पतलुन की जगह जींस दिखने लगे हैं ।छुप-छुप कर ही सही लड़कियां क्रेजी किया रे........गुनगुनाने लगी हैं ।
खैर रजिया बुआ उस दिन बहुत खुश थी ।पुछने पर कहने लगीं की बिटवा वो दिन गये जब औरतों को जनावर समझा जाता था ।अपनी पूरी जिंदगी चौके-चुल्हे में ही खत्म हो जाती थी ।अब तो हमारा राज आने वाला है ।
मैने कहा कैसे तो उन्हें बड़ा अचरज हुआ ।
कहने लगीं कि अरे सरकार ने हम लोगो को रिजर्वेशन दे दिया है। तब मेरे समझ में आया कि वो महिला आरक्षण बिल की बात कर रहीं है । मैं बस चुप-चाप सुनता रहा और वो बोलतीं रही, कि बेटा टी.वी. में बता रहे थे कि अब हमलोग के लिए कानून बनाया जा रहा है।कि अब हमलोग चुनाव लड़ सकते हैं ।और अब हम औरतों को ज्यादा मौका भी मिलेगा ।अब हम लोग के पास ज्यादा अधिकार भी होगा ।अब औरतें और भी ज्यादा ताकतवर होगीं ।और भी न जाने क्या-क्या--------------
और अंत में बुआ ने पुछा की बेटा ऐसा होगा ना लेकिन मेरे पास कोई जवाब न था और मैने बिना कुछ बोले फोन बंद कर दिया

गुरुवार, 8 मई 2008

ये आसमां तेरा है

पंख मिल गये तुम्हें,अब आसमान तेरा है
गगन का हर किनारा तेरा है


अपने सपनों को नई उड़ान दो
अपने नाम को नई पहचान दो


तुम्हें बुलंदियों को छुना है
थपेड़ों से लड़ना है
जीवन के इस सफर में
नये मुकामों को गढ़ना है


भूखी आंखें,मुखौटे लगाये चेहरे
हर मोड़ पर मिलेंगें तुम्हें
इन कांटों के बीच
इक नया रास्ता बनाना है


मंजिलें तुम्हें मुबारक हो
पर रास्तों का ख्याल रखना
आस-पास के लोगों
और बातों का ख्याल रखना


गलियां तंग ,रास्ते संकरे
सफर भी लंबा होगा
पर पास की आसान लगती
राहों से बचके रहना


उड़ो खुब उड़ो अब आसमां तेरा है
बस झूठी जिंदगी और
दुसरों के सपनों से बच के रहना

सोमवार, 10 मार्च 2008

हार गई हॉकी

दिल्ली में किक्रेट के सूरमाओं के स्वागत के फूल अभी मुरझाए भी नहीं थे कि हॉकी के कांटों ने जख्मी कर दिया ।
आखिर जिम्मेदार कौन है ?लोग कोच या हॉकी महासंघ के अध्यक्ष के पी एस गिल को दोषी मान रहे हैं ।लेकिन क्या हमलोग अपने गिरेबां में झांक रहे हैं ?क्या हमारे अंदर हॉकी बची थी? ये कोई पहली हार नही हैं ।क्या इससे पहले हॉकी के हार पर हम सड़को पर उतरे थे ?
मै जानता हूं सड़क पर उतरना हल नही हैं ।लेकिन कम से कम इससे हमारे लगाव का पता तो चलता ही है ।हॉकी के गिरते स्तर के लिए महासंघ तो जिम्मेदार है ही ,पर कम दोषी हमलोग भी नहीं ।आज हमलोग जो इस हार पर चिल्ला रहे हैं,इसकी मौत में हमारा भी बड़ा हाथ है ।क्या हमने हॉकी को वो जगह दी जो बतौर राष्ट्रीय खेल उसे मिलनी चाहीए ?
दिल पर हाथ रखिए क्या इसी देश में हॉकी के साथ सौतेला व्यवहार नही हुआ है ? क्या धोनी,सचिन और द्रविड़ की तरह हमने अपने कमरों में धनराज पिल्ले और दिलीप टिर्की की तस्वीर कभी लगाई ? गांगूली को टीम से निकाले जाने पर जिस तरह का विरोध सड़क से लेकर संसद तक हुआ क्या वही आवाज धनराज को टीम से निकाले जाने के वक्त सूनाई दी ?आज किक्रेट में बल्लेबाजों का क्रम बदल दिया जाए तो चाय के नुक्कड़ से लेकर संपादकों के कमरों में बहस होने लगती है लेकिन जब हॉकी में अनाप शनाप फैसले लिए जा रहे थे तो क्या वो सब्जी की कीमतों में हो रही बढोतरी से ज्यादा महत्वपूर्ण लग रही थी ।
हम इतिहास और गौरवशाली अतीत की बात करते हैं लेकिन क्या हमने हॉकी को अपने ही देश में धर्म का दर्जा दिया ।धोनी का सिक्सर जो राहत हमें देता है क्या वही सुकून दिलीप की पेनाल्टी दे पाती है ।सचिन का 99 पर आउट होना जिस तरह दप्तर लेट पहुंचने से ज्यादा परेशान करता है क्या वही गुस्सा सेंटर फारवर्ड के असफल हो जाने पर पैदा होता है ।----------शायद नहीं ।
इसलिए हॉकी की इस हालत के लिए हम सब जिम्मेदार हैं ।

ये समाज के नये नायक हैं ।

अनामिका,रोहनप्रीत और तन्मय ने लिटील चैम्पस प्रतियोगिता में जीत दर्ज की ।
ये एक शो के विजेता भर नहीं समाज के नये नायक हैं ।नायक इसलिए कि इन्होंने सपनों को साकार करने की राह दिखाई है ।नायक इसलिए भी कि मरियानी,पटियाला और लखनउ जैसे छोटे शहरों से आकर ये महानगरों में अपनी जीत दर्ज कराते हैं ।इन नन्हें विजेताओं की जीत बताती है कि मन में लगन और दिल में जूनुन हो तो आसमां को भी करीब लाया जा सकता है ।ये शाहरूख और अमिताभ की तरह सपनों की कोई दुनिया नहीं रचते बल्कि मासूम आंखों में देखे गये ख्वाब के सच होने की कहानी बयां करते हैं ।
ये बच्चे हाशिए पर खड़े एक बड़े तबके के हौसलों की जीत की कहानी कहते हैं ।तालियों की गड़गड़ाहट और जगमगाती रोशनी सिर्फ इनके इनके चेहरों पर ही लाली नहीं लाती बल्कि महानगरों से दूर रह रहे कई बच्चों के आंखों में सपनों की बुनियाद खड़ी करती हैं ।इनकी जीत उस मिथक को भी तोड़ती है कि मध्यम वर्ग के मां बाप अपने बच्चों को डाक्टर या इंजीनियर ही बनाना चाहते हैं ।
इनको मिले एक करोड़ से भी ज्यादा वोट ये बताते हैं कि महानगरों में रहने वाले लोग छोटे शहरों से निकले इन बड़े नायकों को सलाम कर रहा है ।इनको मिले लाखों का इनाम हाशिए पर खड़े समाज के बुलंद इरादों की कहानी कहता हैं ।
आज जबकि मध्यम वर्ग में कुछ करने की उकताहट और कुछ न कर पाने की वजह से उपजा एक आक्रोश है तो ऐसे में इनकी जीत समाज के उस तबके को खड़े होने का हौसला देता है साथ ही ये भरोसा भी कि वो किसी से कम नहीं ।

गुरुवार, 14 फ़रवरी 2008

मुंबई की सड़कों पे मचे उत्पात पर इस शहर की कहानी मुंबई की ही जुबानी

मैं मुंबई हुं--------------
किसी के लिए हादसों का शहर तो किसी के लिए सपनों की उड़ान । मैंने अपने शरीर पर कई जख्म झेले हैं ।मुझे 1993 का वो खौफनाक मंजर भी याद जब हाजी अली के सजदे और सिद्धीविनायक की आरती में साथ-साथ झूकने वाले सर एक दूसरे के खून के प्यासे हो गये थे ।मैंने भारत में आतंक की पहली दस्तक भी अपने सीने पर झेली है ।
पर तमाम हादसों के बाद मैंने इस शहर को साथ खड़े होते भी देखा है
आज कौन मुंबई का और कौन बाहर वाला इस लड़ाई ने मेरी रूह को घायल कर दिया है ।मेरे लिए दोनों अपने हैं ।जब पूरी मुंबई पानी में डूबी थी या जब आतंकी लोकल ट्रेनों में धमाके कर मुझे डराने में लगे थे तब मेरे दोनो बच्चों के आंखों में आंसू थे ।

मराठीयों नें अगर खून-पसीने से मेरी बुनीयाद खड़ी की है तो उत्तर भारतीयों ने इसे सजाया और संवारा है ।पर आज मेरे एक हाथ ही दूसरे पर वार कर रहें हैं।
मुझे राज ठाकरे और अबू आजमी के बयानों की परवाह नहीं ।लेकिन मुंबई की सड़कों पर मजलूमों के साथ हो रहा अन्नाय मुझे बौना कर देता है ।ये तोड़फोड़ मुझे आभास दिलाते हैं कि मैं खुद को इतना बड़ा न कर पाया कि मराठी और गैर मराठी दोनों को मुकम्मल जहां दिला सकुं।

इन्हें पता नहीं कि जिस आवाज के पीछे ये चल रहें हैं वो इनके बीच एक ऐसी दरार बनाना चाहता है जिस पर चलकर उसके हित पूरे हो सकें ।मुझ डर बस इस बात का है कि सपनों के इस शहर के सपने कहीं बीच रास्ते में हीं न टूट जाये ।

सोमवार, 11 फ़रवरी 2008

कौन किसका आदमी

इसका आदमी,उसका आदमी---------------------आखिर कौन किसका आदमी ।
पत्रकारिता में ये बीमारी तो पहले से थी लेकिन अब इसने महामारी का रूप ले लिया है। कस्बों और गांवों में औरतों के आदमी हुआ करते हैं लेकिन यहां आदमीयों के आदमी हैं। अन्दर आने के लिए किसी का आदमी, बने रहने के लिए किसी का आदमी और आगे बढ़ने के लिए भी किसी का आदमी होना बेहद जरूरी है।
घर बैठ किसी के साथ सुरापान तो कर सकते हैं लेकिन दफ्तर के आहाते में किसी के साथ चाय की चुस्की भी ली तो उसके आदमी। नतीजा... आपका साथ देने वाला शख्स अगर दफ्तर में हावी है तो चौका वरना आप तत्काल प्रभाव से टीम के सोलहवें खिलाड़ी की मानिंद। चौके लगाने का दमखम रखते होंगे अपनी बला से लेकिन फिलहाल तो किस्मत पर ग्रहण लगता जान पड़ता है। मानो पेप्सी की बोतल लेकर ब्रेक का इंतजार करना ही भाग्य में बदा है।
शायद वो समय कुछ और रहा होगा जब दादा परदादा कहा करते थे कि सबसे मिलकर रहो लेकिन अब तो हालात ये है कि इधर के रहो या उधर के रहो ।पत्रकारिता में नये हैं या युं कहें कि नौसिखये हैं तो किसी का आदमी होना और भी जरूरी है। चुंकि बेलौसपन से किसी के आदमी हो जाने का खतरा बढ़ जाता है । इसलिए बचना थोड़ा मुश्किल है
डर तो है लेकिन अर्थशास्त्र की परिभाषा के अनुसार जोखिम उठाने वाले ही उद्यमी कहलाते हैं ।इसलिए आप अगर इस बीमारी को जीना सीख गये या युं कहें कि पाला बदलनें मे माहिर हो गये तो रिलांयस मोबाइल की तरह दुनिया आपकी मुट्ठी में ।
मेरे एक सहयोगी वसीम बरेलवी का एक शेर गाहे बगाहे गुनगुनाते हैं -------मेरा अहले सफर कब किधर का हो जाए,ये वो नहीं जो हर रहगुजर का हो जाए—जिने का हक सिर्फ उसी को है दुनिया में जो इधर का लगता रहे और उधर का हो जाये ।
पर सातवीं में तो मेरे मौलवी साहब ने बताया था कि आदमी तो वही है जो इसका भी रहे और उसका भी हो।पर छोटे से अनुभव और कइ अपरिचित कहानियों के बाद अब मौलवी साहब झूठे और बोमानी लगने लगे हैं ।